Saturday, December 8, 2018

सज्जन किसे कहा जाए?

©संध्या पेडणेकर
आसान लगनेवाले इस कठिन सवाल का हल बताते हुए तुकाराम ने कहा है- चंदनाचे हात पायहि चंदन । परिसा नाहीं हीन कोणी अंग ॥१॥ दीपा नाहीं पाठीं पोटीं अंधकार । सर्वांगी साकर अवघी गोड ॥२॥ तुका म्हणे तैसा सज्जनापासून । पाहतां अवगुण मिळेचि ना ॥३॥ -संत तुकाराम, 3314 हिंदी में - चंदन के हाथ और पैर भी चंदन। पारस का कोई अंग हीन नहीं।।1।। दीप के आगे-पीछे अंधेरा नाहीं । शकर अंंतर्बाह्य मीठी होय।।2।। तुका कहे वैसे सज्जन के संग। ढूंढे से अवगुण ना मिले।।3।। अनुवाद - ©संध्या पेडणेकर
थोडा विस्तार से कहें तो, चंदन शब्द से हमें सुगंध महसूस होती है, खुद घिस कर चंदन औरों के जीवन में सुगंध और शीतलता भर देता है। अंतर्बाह्य निर्मल होता है चंदन। लोहे की गुणवत्ता बढाता है पारस। उसका कोई अंश इस गुण से अछूता नहीं होता। वह पूरा का पूरा परोपकारी होता है। दीप के आस-पास कभी अंधेरा ठहर नहीं पाता। शक्कर हर अंग से मीठी होती है। अंदर से और बाहर से भी। तुकाराम कहते हैं कि, सज्जन व्यक्ति भी इन्हीं की तरह होता है। ढूंढे से भी उसमें अवगुण नहीं मिलते। चंदन यानी सुगंध और शीतलता, पारस यानी परोपकार- स्पर्श मात्र से गुणवत्ता बढ़ानेवाला, दीपक यानी उजाला, शक्कर यानी मिठास। साथ ही यहां तुकाराम ने इनमें अतर्निहित एक और गुण भी बताया है - घिस कर, जल कर और घुल कर भी वे अपने गुणों का त्याग नहीं करते। उनके कारण किसीका बुरा नहीं होता। तुकाराम सज्जन उसको बताते हैं जो पारदर्शी अच्छाई से परिपूर्ण हों। जो उनके संपर्क में आए, उसके जीवन में सुगंध, शीतलता, उजास और मिठास जैसी सकारात्मकता भर देते हैं, उसके व्यक्तित्व को उदात्त बनाते हैं। सज्जन की इस परिभाषा से किसे इनकार होगा? यहां सुनिये पद सुमन कल्यणपुर की आवाज में - https://www.youtube.com/watch?v=3LF_wh0fN90

Saturday, June 27, 2015

महाराष्ट्र की समृद्ध खानपान परंपरा
-संध्या पेडणेकर
भारत के अन्य राज्यों की खानपान परंपराओं की तरह ही महाराष्ट्र की भी श्रेष्ठ खानपान परंपरा है। यहां के वडा-पाव, उसळ-पाव को दुनिया भर में पसंद किया जाता है। इसी प्रकार झुणका-भाकर, वरण-भात, पुरणपोळी, आम्रखंड, श्रीखंड, आमरस आदि व्यंजन भी लोगों को पसंद आते हैं। मोटे तौर पर महाराष्ट्रीय व्यंजनों को कोकणी, पुणेरी, मराठवाडी, कोल्हापुरी और वऱ्हाडी इन पांच हिस्सों में बांटा जा सकता है। ये पांच विभाग भौगोलिक स्थिति के आधार से बनाए गए हैं।
महाराष्ट्र में करीब 65 प्रतिशत लोग खेती से जुड़े हैं और गन्ना, बाजरा, अलसी, ज्वार, मुंग, मोठ, तिल, मुंगफली, चावल, उरद, गेहूं, मक्कई, मोरधन, राला (मोरधन जैसा काले, पीले और सफेद रंग का चावल), श्यामक, अरहर, चना, मसूर, चौलाई आदि अनाज की खेती होती है। फलों में चीकू, केला, आम, संतरा, अंगूर आदि फलों की खेती होती है। इन्हीं अलग अलग व्यंजन पूरे महाराष्ट्र में प्रदेशविशेष के आधार से बनते हैं।

कोंकणी व्यंजन -
इमली के घोलवाले पोहे - चावल से बनाए जानेवाले पोहे या चिडवा के विभिन्न व्यंजन महाराष्ट्र में लोकप्रिय हैं। पोहे को हम देसी फास्टफूड की श्रेणी में रख सकते हैं। चावल के सभी पोषक तत्व इसमें  होते हैं। सूखे पोहे के, भिगाए पोहे के, तले पोहे के कई तरह के स्वादिष्ट व्यंजन बनाए जाते हैं। इमली के घोल के साथ बनाए जानेवाले ‘कोळाचे पोहे’ भी बहुत स्वादिष्ट होते हैं। इसके लिए पोहे को नारियल के दूध में भिगोते हैं। लगभग पोहे की बराबर मात्रा में कसा हुआ कच्चा नारियल मिलाते हैं। फिर इसमें कसा हुआ गुड़ और इमली का घोल मिलाते हैं। ऊपर से घी-जीरे का तड़का लगाते हैं। लोजी, तैयार हैं, इमली के घोलवाले पोहे।
कानुले/घावन और घाटले – 1. घाटले - नारियल के दूध में गुड, पिसी इलायची मिला कर घाटले बनाया जाता है जिसे गुळवणी भी कहते हैं। 2. (क) कानुले - यानी पुरण भर कर भाप पर बनी मोटी रोटी। गेहूं के आटे और सूजी को साथ में गूंथ कर या मैदे को गूंथ कर छोटी छोटी लोइयां बना ली जाती हैं जिन्हें छोटा बेल कर आधे हिस्से में पूरण भरते हैं, फिर एक बार यही कृति दोहराते हैं जिससे कि पूरण भरी तिकोनी लोई तैयार होती है। इसे थोडा फैला कर भांप में पका लेते हैं। इसके लिए बड़े से भगौने में चौथाई से थोड़ा कम हिस्सा पानी डाल कर पानी को  उबालते हैं और उसमें थोडा घी या तेल डालते हैं। भगौने के ऊपर छाननी रखते हैं या कप़ा बांधते हैं और इसमें कानुलों को ढंक कर पकाते हैं। (ख) पुरण - चने की दाल को उबाल कर गला लेते हैं। पानी निथार कर पकी दाल में  गुड मिला कर गाढा होने तक भूनते हैं। ठंडा होने पर इसे महीन पीस लेते हैं। इसमें सुगंध के लिए सोंठ और जायफल मिलाते हैं। 3. घावन - चावल के आटे से बने जालीदार डोसे को घावन कहा जाता है।
लाही के लड्डू –भडभूंजे द्वारा चावल, ज्वार, बाजरा, मक्कई, रागी, गेहूं आदि अनाजों को भून कर फुलाते हैं तब उन्हें लाही कहते हैं। अंग्रेजी में इसे पॉप कहते हैं और हम सब पॉप कॉर्न से भलीभांती परिचित हैं। अनाज से बनी लाहियों को पीस कर, गीला करने भर के लिए दूध मिला कर, गुड़, पिसी इलायची और मेवे मिला कर लड्डूं बांध दिए जाते हैं। स्वादिष्ट होने के साथ साथ ये लड्डू पोषक और सुपाच्य होते हैं।   
ईंदर या पेवसी – ब्याई हुई गाय या भैंस के पहले सात दिनों के दूध से बननेवाली मिठाई। बनाने की विधि – ब्याई हुई गाय या भैंस का पहले सात दिनों का गाढ़ा दूध, उसका एक चौथाई सादा दूध, कसा हुआ गुड और पिसी इलायची। सभी चीजों को साथ मिला कर गुड को दूध में अच्छी तरह घोल लें। घोल को सीटी बिना लगाए कुकर में 15-20 मिनट भंपा लें। जमने के लिए कुकर से निकाल कर हवादार जगह में रखें। हल्का ठंडा होने पर फ्रीज में रख कर अच्छी तरह ठंडा करें। छुरी से काट कर टुकडे बना कर परोसें। गरम तासीर वाली यह मिठाई ठंड के दिनों में खाना सेहत के लिए फायदेमंद रहता है।
तवसाळे या धोडस – हरी ककडी, सूजी, कच्चे नारियल का कसा हुआ खोपरा, बादाम-काजू-पिस्ते-किशमिश आदि सूखे मेवे, गुड आदि से यह केक बनता है। ककडी को कस कर निचोड लें। उसमें सूजी, सूखे मेवे, खोपरा, गुड़ आदि मिला कर पिलपिला गूंथ लें। केक के बर्तन में 15-20 मिनट तक पकाएं। जालीदार और खूब फूला हुआ चाहें तो घोल में थोड़ा बेकिंग पाऊडर मिला लें। केकपॉट से निकालने के बाद ठंडा करें और टुकडे काट कर परोसें ।
भाजणी का आटा – भून कर पिसे अनाज और दालों के आटे को भाजणी का आटा कहते हैं। विभिन्न व्यंजनों के लिए अलग अलग अनुपा में अनाज और दालें मिला कर भून कर पिसाते हैं। इसप्रकार चकली की भाजणी अलग होती है, धिरडे की भाजणी अलग। धिरडे – उपलब्ध सभी तरह के अनाज और दालों को मिला कर हल्का भूंज कर ठंडा कर लेते हैं। साथ में धनिया दाना, जीरा, हींग, सूखी लाल मिर्चें, मेथीदाना भी हल्का भून लेते हैं। सभी चीजों को दरदरा पीस कर रखते हैं। यह आटा हवाबंद कनस्तर में दो-तीन महीनों तक अच्छा बना रहता है। ज़रूरत के अनुसार भाजणी का आटा लेकर उसमें बारीक कटी प्याज, हरी मिर्च, हरा धनिया मिलाएं, पानी मिला कर पकौडियों जितना ढीला आटा बना लें और घी लगे तवे पर चम्मच से फैला कर दोनों तरफ से अच्छी तरह पका लें। मोटा धिरडा अच्छी तरह पकाने के लिए उसमें जगह जगह छेद बनाए जाते हैं और खूब घी या तेल दिया जाता है। रोटी के आटे की तरह गूंथ कर, बेल कर भी बनाया जाता है लेकिन भूनने का तरीका वही होता है। घर के बने मक्खन के साथ परोसे गए धिरडे का स्वाद आंख, नाक, जीभ, पेट और दिल को तृप्ति का अहसास देता है। भारी व्यंजन होने के कारण इसे छोटे छोटे कौर में खूब चबा कर खाना चाहिए।

पुणेरी व्यंजन -
पुणे को महाराष्ट्र की सांस्कृतिक और अब शैक्षिक राजधानी कहा जा सकता है। यहां का खानपान कोकण की तरह ही लगभग होता है। यहां के खास व्यंजन हैं वरण-भात-तूप-मेतकूट (पीली दाल-चावल), उसळ-पाव, अळूवडी, बाकरवडी, कटाची आमटी, झुणका-भाकर और मिठाई में श्रीखंड, पुरणपोळी, आम्रखंड, शिरा(हलवा)-पुरी, सुधारस-पुरी आदि।
वरण-भात – लगभग हर रोज के खाने में बननेवाला वरण-भात बनाने का तरीका एकदम आसान है। अरहर या मुंग की दाल को अलग बर्तन में पकाना है। उबाल आने पर उसमें हींग और हल्दी मिलानी है। दाल अच्छी तरह से गल जाए तो आंच से हटा कर चावल के साथ परोसते हैं। दाल-चावल पर घी डाला जाता है और साथ में मेतकूट होता है– जो विभिन्न दालों और मसालों को मिला कर खास तरह से बनी सूखी चटनी होती है। वरण-भात की तरह ही मुंग के दाल की खिचडी घी-दही-मेतकूट और पापड के साथ भी खाया जाता है। इन्हें खास व्यंजन तो नहीं कहा जा सकता लेकिन घर की याद आने पर अक्सर विदेशों में पुणे के लोगों को इसकी याद ज़रूर आती है जिस कारण यह विशिष्ट व्यंजन बन जाता है।
उसळ-पाव – साबूत मुंग, मोठ, चौलाई, मटर, अरहर आदि को अंकुरित कर बनाई गई रस्सेदार सब्जी को उसळ कहते हैं जो रोटी, चावल या पाव के साथ खाई जाती है। इसमें सभी तरह के गरम मसाले होते हैं और अवश्यंभावी रूप से यह बेहद तेज स्वाद वाली होती है। जो एक बार उसळ खा ले वह आमतौर पर कभी उसका स्वाद भूलता नहीं। पुणे की तरह ही कोल्हापुर की उसळ भी महाराष्ट्र में अलग से मशहूर है।
अळूवडी – अरवी के पत्तों से बननेवाला स्वादिष्ट व्यंजन है अळूवडी। डंठल हटा कर अरवी के पत्तों को अच्छी तरह से धो-सुखा लेते हैं। बेसन में इमली का गूदा, मिर्च, हल्दी, पिसा हुआ जीरा-धनिया, नमक मिला कर भजिए से हल्का गाढ़ा घोल बना लेते हैं। अरवी के पत्तों पर उलटी तरफ इस घोल की पतली परत फैला कर तीन-चार पत्ते एक के ऊपर एक रख कर लपेट लेते हैं। फिर कुकर में बिना वजन दिए इन्हें पांचदस मिनट तक भाप देकर ठंडा कर चकतियों में काट लेते हैं। फिर तल कर ऊपर से भुना तिल बुरक कर या तो खाने में साइड डिश की तरह सूखा खाते हैं, चटनी-सॉस के साथ खाते हैं या मसाले का झोल बना कर उसमें इन्हें डाल कर अळूवडी की रस्सेदार सब्जी बना लेते हैं।
कटाची आमटी- महाराष्ट्र की पुरणपोळी सबदूर मशहूर है। इसके लिए चने की दाल उबालने के बाद जब निथारते हैं तब बचे हुए पानी से यह सांभरनुमा दाल बनती है जिसे कटाची आमटी कहते हैं। इसमें मेथी-हींग, प्याज-टमाटर का तड़का लगता है और गरम मसाला पड़ता है। इसे पुरण पोळी के साथ भी खाते हैं या जायका बढ़ाने के लिए खाना खाते हुए बीच बीच में इसकी चुस्कियां ली जाती हैं बिल्कुल सोल कढी की तरह।
सोलकढी – महाराष्ट्र की ही खास उपज अमसूल या कोकम से सोलकढी बनती है। इमली जैसा ही फल होता है अमसूल का लेकिन आकार में वह टमाटर की तरह और दिखने में आलूबुखारे की तरह होता है। इन्हें सुखा कर रखा जाता है। या इनका अर्क उतारते हैं जिसे आगळ कहते हैं। यह पित्तशमन की खास दवा के तौर पर जाना जाता है। कोकम से सोलकढी और शरबत आदि बनते हैं। सोलकढी बनाने को लिए कच्चे नारियल को कस-निचोड कर दूध निकाला जाता है। पसंद के अनुसार उसे गाढा-पतला बनाते हैं। उसमें कोकम का आगळ, नमक, हरी मिर्च मिलाते हैं। गुलाबी रंग का यह पेय पदार्थ बेहद स्वादिष्ट, जायका बढ़ानेवाला और ठंडक पहुंचानेवाला होता है।
श्रीखंड – दही को कपडछान कर लेते हैं। गाढे दही में चीनी, पिसी इलायची, केशर की सुगंध मिलाते हैं। साथ में सूखे मेवे डाल कर श्रीखंड बनाया जाता है जो पूडी या रोटी के साथ खाते हैं। आम्रखंड – दही में आम का गूदा मिला कर जब यह पकवान बनता है तब उसे आम्रखंड कहते हैं।
सुधारस – चीनी के घोल को उबाल कर उसमें नींबू निचोड देते हैं जिससे हल्के गुलाबी रंग का रस बनता है। इसमें केले की चकतियां, पिसी इलायची और केशर मिलाते हैं। पेशवा के जमाने में बननेवाले व्यंजनों में सुधारस का भी जिक्र मिलता है।

मराठवाडी व्यंजन –
मराठवाडा के व्यंजनों में खास कर प्रसिद्ध हैं पानगे, धपाटे, येसर। मेथांबा भी यहां बड़े प्यार से खाया जात है।
मेथांबा – कैरी से बननेवाला यह व्यंजन लोंजी की तरह होता है। कैरी की बडे आकार की फांकें काट लेते हैं। अन्य चीजों के साथ इसके तड़के में मेथीदाने डालते हैं। हींग, मेथीदाने, सरसों के तड़के में पानी मिला कर कैरी को गलाने के बाद उसमें गुड डाला जाता है जिससे चाशनी गाढी बनती है और स्वाद खट्टा-मीठा बनता है। चावल या रोटी के साथ इसे खाया जाता है।
पानगा – पानगा एक तरह का फुलका ही कह सकते हैं। आटे में घी या तेल का मोयन देकर हींग, जीरा, नमक मिला कर गूंथ लेते हैं। फिर इसकी छोटी छोटी लोइयां बना कर हाथ पर ही पूड़ी जितनी फैला कर पहले तवे पर और फिर सीधे आंच पर पकाते हैं। मेथांबा के साथ भी पानगे अच्छे लगते हैं।
खिचडी-येसर – येसर खास मराठवाडा की देन है। इसे विभिन्न दालों के आटे का बेसन भी कह सकते हैं हालांकि यह अपेक्षाकृत पतला होता है। इसके लिए आटा पिसा कर रखा जाता है। एक बार पिसा आटा दो-तीन महीनों तक इस्तेमाल किया जा सकता है बशर्ते कि ठीक से ढंक कर हवाबंद तरीके से रखा जाए।
येसर का अटा बनाने की विधि – गेहूं, चना दाल, ज्वार, बाजरा, धनियादाना, सूखा खोपरा, जीरा, काली मिर्च, लौंग, बडी इलायची, दालचीनी और पत्थरफूल को अलग अलग भून कर साथ पिसाकर रखते हैं।
खिचडी के साथ येसर खाया जाता है।

कोल्हापुरी व्यंजन –
कोल्हापुर का तांबडा (लाल) और पांढरा (सफेद) रस्सा मशहूर है। हालांकि ये सामिष भोजन के प्रकार हैं।


निरामिश भोजन में यहां की उसळ, मिसळ और चिवडा बेहद लोकप्रिय हैं। यहां ज्यादातर अंकुरित मोठ की तेज-मसालेदार उसळ बनती है जो पाव के साथ खाई जाती है। मिसळ में तुरंत खानेलायक रसोई के अन्य सभी व्यंजनों को मिला कर उनके ऊपर उसळ का रस्सा डाल कर खाते हैं। साथ में स्वाद बढ़ाने के लिए होती है हरी मिर्च। जब तक नाक-आंख से पानी ना बहाए तब तक कोल्हापुर की उसळ या मिसळ को अच्छा नहीं माना जाता।
चिवडा और भडंग – पोहे और कुरमुरों में मसाले, मुंगफलियां, भुने चने की दाल, सूखे खोपरे के टुकडे और कढीपत्ता के पत्ते मिला कर बननेवाले चिवडा और भडंग की सुगंध भी मन मोह लेती है।

खानदेशी व्यंजन –
खानदेशी व्यंजनों में मशहूर हैं कळण , सफेद बैंगनका भर्ता, मूंग के एडणे, मेथी का खुडा, भेंडके और शेवभाजी।
कळण  -
भेंडके – जवार में थोड़े मूंग मिला कर आटा पिसाते हैं। इस आटे की बनी रोटी को भेंडके कहा जाता है। इसके साथ सफेद बैंगन का भर्ता खाया जाता है। आंच पर भुने बैंगन के गूदे में हरी मिर्च, लहसन, हरी प्याज के पत्ते और बहुत सारा धनिया पत्ता मिला कर भर्ता बनता है।
मुंग के एडणे - कोंकण में बननेवाले धिरडे की तरह ही एडणे भी बनता है। मुंग दाल को भिगा कर दरदरा पीस लेते हैं। उसमें पिसा हुआ धनिया-जीरा मिलाते हैं। घोल बना कर तेल या घी के साथ तवे पर चीले बनाते हैं।
मेथी का खुडा – मुंग के एडणे मेथी के खुडा के साथ खाया जाता है। मेथी के कोंपलों को लहसन, मिर्च के साथ मसल कर उसमें तेल, नमक मिलाते हैं।
शेवभाजी – नाम से ही स्पष्ट है कि यह शेव से बननेवाल व्यंजन है। अलग अलग तरह की शेव से अलग अलग तरह की सब्जियां बनती है। उसळ-पाव की तरह ही शेवभाजी भी बेहद चपटी सब्जी है जो केवल याद भर से जीभ के झरनों के सोते जगा दे। खास खानदेसी काले मसाले के साथ बनी झोल वाली शेवभाजी पढ़-सुन कर नहीं बल्कि खाकर ही जानी जानी चाहिए। शेवभाजी की एक और खासियत है कि आप चाहें तो इसे नाशअते की तरह भी खा सकते हैं। वैसे इसे रोटी या पाव के साथ खाया जाता है।

वऱ्हाडी व्यंजन – भजी-भात, गोळा-भात, भरवां ढेमसे (टिंडे), इमली का सार, खांडोळी, पातोडी, सरगुंडे आदि वऱ्हाड प्रांत के महत्वपूर्ण व्यंजन हैं। इनके अलावा पुडाची सांबारवडी, वरण, बेसन, मुंगवड्या, चुनवड्या करोडा, तिल की सब्जी आदि रोजमर्रा के व्यंजनों में गिनाए जा सकते हैं।  
पातोडी – भुने प्याज, भुने खोपरे, खसखस, मुंगफली. कालीमिर्च, लौंग, तेजपत्ता भून कर थोडी चना दाल और थोडे चावल के साथ पीस लेते हैं और बेसन की तरह बनाते हैं। तैयार आटे का पानी में मिला कर घोल बनाते हैं। घोल में अजवाइन, पिसी मिर्च और हल्दी, नमक मिलाते हैं। इसे सरसों, लहसन, जीरे का तडका लगाते हैं।
सरगुंडे - भुट्टे के डंडों पर गेहूं की सेवइयां लपेट कर सुखा ली जाती हैं। इन सरगुंडों को भाप में पका कर आम रस के साथ परोसा जाता है।
कोरोडा – दही में बेसन,कसी ककडी मिलाते हैं। घोल बना लेते हैं। इसमें हींग, हरी मिर्च, कढीपत्ते का तड़का लगा कर बेसन बना लेते हैं। आमतौर पर बननेवाली जवार की रोटी के साथ इसे खाया जाता है।
महाराष्ट्र के अन्य हिस्सों में जहां चने की दाल का पुरण बनता है वहां खानदेश में अरहर की दाल का पुरण बनता है।

स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने के बावजूद मैगी जैसी चीजों को भारत जैसे समृद्ध खाद्यसंस्कृति वाले देश में इतनी व्यापक सार्वजनिक स्वीकृति मिलने की केवल एक ही वजह है और वह है उसे बनाने की सहूलियत। इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण वजह है कि दो मिनट में तैयार होनेवाले व्यंजन खानेवाले के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड कर सकते हैं, या खानपान और स्वास्थ्य का करीबी संबंध होता है इस बात का अहसास कई लोगों को नहीं होता।

सुंदर दिखाई देनेवाले, स्वादिष्ट, मनभावन महकवाले व्यंजन बनाने के लिए कम समय और कम मेहनत लगे यह खयाल बदलते समय की मांग है जिसे हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। संयुक्त परिवारों में कई औरतें अपना पूरा समय देकर जो और जैसे व्यंजन बना लेती थीं, घर के हर सदस्य के स्वास्थ्य और पसंद का जैसा खयाल रखती थीं वैसे आज के एकल और दुगनी आमदनी वाले परिवार में संभव नहीं। आज लोगों के पास पैसा है, एकदूसरे के प्रति अपनत्व भी है लेकिन समय की बेहद कमी है। इसलिए, सहूलियत से बनाए जा सकनेवाले, स्वास्थ्यवर्धक और अपने देश की भौगोलिक स्थितियों के साथ मेल खानेवाले पदार्थों के पर्याय अगर बाजार में जल्द से जल्द नहीं उतारे गए तो मैगी की जगह कोई और कंपनी के नूडल्स, पास्टा, पित्झा, बिस्कीट, ब्रेड, फ्लेक्स, चिप्स, बर्गर आदि लेंगे।

भारत जैसे विशाल और विभिन्न बोली-भाषाओं के देश में खानपान का भी बड़ा वैविध्यपूर्ण चलन रहा है। बंगाल हो या केरल, कर्नाटक हो या असम हर प्रदेश की अपनी समृद्ध खानपान परंपरा है। स्थानीय उपज पर आधारित व्यंजन बनते हैं जिनमें से कइयों को आज भारत में ही नहीं विदेशों में भी खासी लोकप्रियता हासिल है। छोटे उद्योगों को स्थानीय उपज के सहारे स्थानीय पसंद के व्यंजन बनाने के लिए अगर बढ़ावा दिया जाए तो स्वास्थ्यवर्धक, पारंपरिक विविध व्यंजन स्थानीय बाजारों में उपलब्ध हो सकते हैं। परिवहन का खर्च कम होने के कारण उनकी कीमतें भी अपेक्षाकृत कम होंगी।  
महाराष्ट्र के कुछ तुरंत बननेवाले तो कुछ मेहनत से बनने वाले व्यंजनों का परिचय यहां दिया गया है जो हैं सादे लेकिन जायके में सभी अव्वल हैं।   


Tuesday, August 26, 2014

श्याम की मां

©संध्या पेडणेकर
‘श्यामची आई’ मराठी की बेहद लोकप्रिय किताब है। हाल ही में इस किताब का दिल्ली के प्रभात प्रकाशन के लिए मैंने हिंदी में अनुवाद किया। महाराष्ट्र में 1950-60 के दशक में 14-15 वर्ष या उससे अधिक आयु का बिरला ही कोई मराठी पाठक होगा जिसने यह किताब ना पढ़ी हो। तब किताबें इतनी सहूलियत से उपलब्ध नहीं हुआ करती थीं। दूरदराज के गांवों में लाइब्रेरी में लंबे समय तक इस किताब के लिए क्लेम लगाना पड़ता था। मैंने इसी प्रकार यह किताब पढ़ी थी। औरों की तरह ही मैं भी बेहद प्रभावित हुई थी। मां और बेटे के रिश्ते के बारे में हिंदी में आई मन्नू भंडारी जी की किताब ‘आपका बंटी’ ने भी मुझे उतना ही प्रभावित किया था हालांकि ‘आपका बंटी’ का कैनवस और समय ‘श्याम की मां’ से अलग है। हिंदी में इसका शीर्षक मैंने ‘श्याम की मां’ ही दिया है। मूल कृति से मिलता जुलता और एकदम आसान। मैं मानती हूं कि शब्दों को समझने में पाठकों को जितनी कम मशक्कत करनी पड़ती है, वाक्यों के सिरे जितनी आसानी से उनकी समझ में आते हैं पाठक किताब के कथ्य से उतनी ही आसानी से जुड़ पाते हैं। खैर।
10-12 वर्ष की कच्ची उम्र में आप जिस किताब से प्रभावित होते हैं, ज़रूरी नहीं कि उम्र के 53-54 वें साल में भी वह किताब आपको उसी तरह प्रभावित करे। उम्र के विभिन्न पडावों से, अलग अलग अनुभवों से होकर जब आप गुजरते हैं तब बचपन की पसंद सपनीली और अवास्तविक लगने की संभावना अधिक होती है। लेकिन ‘श्यामची आई’ किताब के साथ ऐसा नहीं हुआ। इतने लंबे अंतराल के बाद भी यह किताब मुझे बेहद पसंद आई, प्रेरणादायक लगी हालांकि कुछ लोगों की राय है कि किताब बेहद सरल है, सपाट और अतिभावुक ढंग से इसमें बातें सामने रखी गई हैं। सो मैंने सोचा, क्यों न इस बार एक पाठक की नज़र से नहीं बल्कि एक समीक्षक की नज़र से परखूं।
‘श्याम की मां’ में जीवन की छोटी छोटी घटनाओं के जरिए लेखक ने एक नायक का चित्र उकेरा है। ऐसा नायक जो सामान्य लोगों में से एक है। हालात के थपेडे खाते हुए उसका जीवन बीतता है लेकिन अपने आदर्शों से किसी हाल में न डिगने की उसने ठान ली है। बालबुद्धि के कारण तो कभी अनजाने उससे  गलतियां होती हैं और हर बार मां उसे लक्ष्य की राह पर वापस ले आती है। पुस्तक का शीर्षक मां होने और पूरी पुस्तक में मां की महिमा का वर्णन किए जाने के बावजूद मेरी नज़र में इस चरित्रात्मक कथासंग्रह का नायक श्याम ही है। कथासंग्रह की सारी घटनाएं उसीसे संबंधीत हैं। मां श्याम का आदर्श ज़रूर है लेकिन घटनाएं श्याम के कारण ही घटित होती हैं और उन घटनाओं को सिला देने के लिए मां है। इस कारण नायकत्व श्याम को देना ही मुझे उचित लगता है।
खुद लेखक ने यह बात दर्ज कर रखी है कि, 9 फरवरी 1933 को इस चरित्रात्मक कथासंग्रह के लिखने की प्रक्रिया शुरू हुई और 13 फरवरी 1933 को उन्होंने किताब लिख कर पूरी की। उनके अनुसार इस किताब में जितनी भी कहानियां हैं उनका मुख्य सूत्र ‘मां की महिमा’ ही है। मां की महिमा के साथ साथ उन्होंने भारतीय संस्कृति का भी सादे, सरल शब्दों में मनोरम चित्रण किया है। इस किताब को प्रकाशित करने से पूर्व साने गुरुजी ने ये कहानियां अपने कई परिचितों को पढ़ने दी थीं। पुस्तक पढ़ कर मां के बारे में अपने मन में जो सम्मान था वह कई गुना बढ़ने की बात उनके परिचितों ने कही। उन्हीं की सलाह के अनुसार लेखक ने किताब प्रकाशित की और वह बेहद लोकप्रिय भी साबित हुई।
स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व लिखी गई इस किताब का आज के जमाने में क्या औचित्य है?- कुछ लोगों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से यह प्रश्न उपस्थित किया तब लग कि इस नजरिए से भी इस पुस्तक को देखना ज़रूरी है। वैसे तो समय के साथ साथ इंसान से जुड़ी हर बात बदलती है, भाषा, सोच, नजरिया, रहन-सहन आदि आदि। लेकिन जीवन से जुड़े कुछेक मूल्य कालातीत होते हैं। देखना होगा कि इस किताब में वर्णित बातें कहां तक आज के समय में भी सार्थक सिद्ध होती हैं। यही सोच कर मैंने अनुवाद की शुरुआत की थी और अनुवाद पूरा करते करते मुझे इसका जवाब ‘हां’ में मिला। मुझे मिले इसी जवाब को मैं यहां शब्दों में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही हूं।
मान्यताओं की नींव पर संस्कृति का निर्माण होता है। क्या अच्छा है, क्या बुरा है, क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए आदि बातें स्पष्ट होते होते संस्कृति का रूप धारण करती हैं। हमारे जीने के ढंग को सलीका देती हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व के भारत और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इतने साल बीत जाने के बाद, प्रगति के नए नए शिखर पादाक्रांत कर चुके, विभिन्न क्षेत्रों में अपनी श्रेष्ठता की छाप छोड चुके भारत के सामाजिक स्तर ने भले ऊंचाई प्राप्त की हो, भारत आर्थिक रूप से संपन्न हुआ हो, सुविधाएं-सहूलियतें अधिक से अधिक जनसामान्यों तक पहुंच रही हों लेकिन भारत की आत्मा अभी अक्षुण्ण है, वह नहीं बदली। और कि, भारत की आत्मा आज भी संपन्नता से श्रेष्ठता को तरजीह देती है। मन की सच्चाई, ईमानदारी, आपसी सहयोग, एक-दूसरे के प्रति सहानुभूति, बड़ों के प्रति आदर, बुरे का तिरस्कार जैसे मूलभूत नैतिक तत्वों को भारतीय समाज मन में अभी श्रेष्ठ स्थान प्राप्त है। इन्हीं तत्वों की पैरवी करती है ‘श्याम की मां’। बयालीस कथाओं के जरिए लेखक ने इस पुस्तक में बताया है कि श्याम के चारित्रिक विकास में श्याम की मां कैसे सहायक, प्रेरणास्त्रोत बनी रही हैं।
किसी समय वैभवसंपन्न रहे जमींदारों के घर में श्याम का जन्म हुआ। हालांकि, होश सम्हालते सम्हालते श्याम ने केवल दुख, अपमान सहते, मेहनत-मजूरी करते अपने माता-पिता को ही देखा। इसके बावजूद श्याम के माता-पिता ने कभी उसे उद्देश्यप्राप्ति के लिए हालात से, अपने सद्गुणों से, विवेकबुद्धि से समझौता करना नहीं सिखाया। अपनी मां के बारे में अपने मित्रों को बताते हुए श्याम कहता है- “मुझमें जो भी कुछ अच्छा है वह सब मेरी मां का है। मां ही मेरी गुरु है, कल्पतरु है। प्रेम से देखना, बोलना, इन्सान ही नहीं प्राणियों, पक्षियों, तितलियों, पेडों से प्रेम करना मां ने ही मुझे सिखाया। बेहद कष्ट में रह कर भी, बिना किसी बात की शिकायत किए, अपना काम बेहतरीन ढंग से करते रहना सिखाया। दरिद्रता में भी स्वाभिमान और नैतिकता गंवाए बिना कैसे रहें, सिखाया।” अपनी मां के बारे में श्याम अपने मित्रों को जो बताता है वही सब इस पुस्तक में कथारूप में एकत्रित है। इन कहानियों के जरिए उनके जीवन के कई प्रसंगों की और उन प्रसंगों में श्याम की मां के आदर्श व्यवहार की बातें इस पुस्तक में हैं। ये आदर्श न तो दैवी हैं न अतिमानवी। सामान्य जीवन की आम घटनाओं में कई बार जब परीक्षा के प्रसंग आते हैं तो व्यक्ति किस प्रकार अपनी सद्विवेकबुद्धि के सहारे उनसे पार पाता है यही इन प्रसंगों से पता चलता है। मसलन्,
मध्य या निम्न मध्यवर्ग के परिवारों में कई काम घर के सदस्यों को ही करने पड़ते हैं। कई बार बच्चों को संकोच होता है कि हमें ये काम करते हुए अगर हमारे मित्र या परिचित देखेंगे तो तो हमारी भद्द होगी, वे हम पर हंसेंगे। ऐसा ही एक प्रसंग इस पुस्तक में है। बीमार मां अपना व्रत पूरा करने के लिए श्याम से कहती है कि वह उनकी जगह बरगद के पेड की प्रदक्षिणाएं लगा कर उनका सावित्री व्रत पूरा करे। श्याम सकुचाता है, तब वह कहती हैं – “मां का बताया हुआ, भगवान से संबंधीत काम करने में शर्म कैसी? शर्म तो बुरा काम करने में आनी चाहिए!” मां की बातों से श्याम की आंखें खुल जाती हैं और वह बरगद की प्रदक्षिणाएं लगा कर मां का व्रत पूरा करता है। अच्छा नहीं, बुरा काम करने में शर्म आनी चाहिए, मां की बात माननी चाहिए – क्या आज के जमाने में यह उपदेश कालबाह्य हो गया है?
इसी प्रकार अगले हर अध्याय में अलग अलग घटनाओं के सहारे वह सामाजिक नैतिकता की कोई न कोई सीख पाठक को देते हैं। जैसे – दहेज पद्धति बुरी है, अपनी खुशी हमेशा सबके साथ बांटनी चाहिए, कच्ची कलियों को तोड़ना नहीं – खिलने का मौका देना चाहिए, सभी को आपस में मिल जुल कर सहभाव से रहना चाहिए, काम या सांपत्तिक स्थिति से किसी व्यक्ति को आंकना नहीं चाहिए, सबके प्रति मन में सम्मान का भाव रखना चाहिए, सबके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए, अपनी कर्तव्यभावना या कर्तव्यतत्परता का बोझ दूसरों को महसूस न हो इसका खयाल रखना चाहिए, घर के काम के बंटवारे में भेदभाव न हो, जिसके हाथ-पैर हैं वह सब काम कर सकता है, जो भी काम करो मन लगा कर करो, झूठ ना बोलो, माता-पिता की बातें मानो, माता-पिता को प्रसंगानुसार कभी कठोर तो कभी ममतामय बनना चाहिए, बेजुबान जानवरों से प्रेम करें, उनका खयाल रखें, दूसरों के महल से अपनी कुटिया भली, घर प्रेम से ही बनता है, भूतदया के साथ साथ समयसूचकता भी ज़रूरी है, बिना जानकारी के इलाज करने से जान भी जा सकती है, बेटे के भले के लिए मां को समयानुसार बेहद कठोर भी होना पड़ सकता है, श्रम में ही आत्मोद्धार है, मुफ्त देने और लेने में पतन है, जीने का अधिकार उसीको है जो कुछ मंगल का निर्माण करता है, एकदूसरे की मदद के लिए हमें हमेशा तैयार रहना चाहिए, चिल्ल-पों मचाने से - जोर शोर से भजन गाने से भगवान नहीं मिलते, दूसरों को तकलीफ हो तो वह भजन कैसा? चोरी-चुगली-बुरी संगत-डर के कारण भागे नहीं, आत्मनिर्भर बनें, किसीको हीन मान कर उसका अपमान ना करें, कृति बिना बोले सिखाती है, प्रत्यक्ष उदाहरण से हम जो सीखते हैं वह सैंकडो व्याख्यान या भाषण सुन कर या किताबें पढ़ कर नहीं सीख सकते, गुणवान इंसान को दुनिया चाहती है, प्रेम के बगैर इंसान जी नहीं सकता, स्थिर और भरपूर प्रेम जीवन के वृक्ष का पोषण करता है, मोह का त्याग ही धर्म है, गरीब का कोई नहीं होता, केवल वाहवाही बटोरने के लिए कोई काम ना करें, घर और बाहर एक-सा व्यवहार रखें, गलतियां करने में कोई बड़प्पन नहीं, गलती हो तो उसे सुधार लें, प्रेम में त्याग का मजा ही कुछ और है, पुरुषों को महिलाओं के और महलाओं को पुरुषों के काम करना आना चाहिए, विवाह यानी हृदय और बुद्धि – भावना और विचारों का मधुर मीलन, पुरुष के हृदय में स्त्री-गुणों का आना और स्त्री में पुरुषों के गुण आना ही विवाह है, गरीबी में भी ऊंचे उद्देश्यों के प्रति समर्पित रहा जा सकता है, भगवान भेदभाव नहीं करता – उसे सभी समान रूप से प्रिय हैं, श्रेष्ठ-कनिष्ठ के झूठे विवाद हमें गाड देने चाहिए, जो अपने भाई से प्रेम नहीं कर सकता वह किसीसे प्रेम नहीं कर सकता, माता-पिता और भाई-बहनों के बारे में शर्म ना महसूस करो, चोरी कभी ना करें, भगवान पर भरोसा रखना चाहिए, सामुदायिक कार्य में जितना कुछ कर सकते हैं करें, मन में श्रद्धा रखें, कर्ज लेना नर्क का टिकट खरीदने जैसा है, किसान पूरी दुनिया के लिए मेहनत करनेवाला गुलाम है, मानव का तिरस्कार करनेवाले नर नहीं नराधम हैं, विद्यादेवि को प्रसन्न करवाकर गरीबी और दरिद्रता से उद्धार संभव है, समयानुसार बदलने में ही भला है, अपनी जिद चलाने से किसीका फायदा नहीं होता आदि। जीवन के ये शाश्वत तत्व कभी कालबाह्य नहीं हो सकते। इन्हीं तत्वों को समझाने के लिए यह पुस्तक समर्पित है। हम इसे कैसे कालबाह्य ठहरा सकते हैं?
संक्षेप में लिखे इन नीति तत्वों से हो सकता है किसीको लगे कि किताब बेहद रूखी, उपदेश भरे वाक्यों से भरी होगी। लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। प्रसंगानुसार एकाध वाक्य में ये बातें कही गई हैं। सभी प्रसंग आम जीवन के लेकिन पुराने समय-संदर्भों के हैं। हालांकि सभी संदर्भ अभी इतने पुराने नहीं हुए हैं कि उन्हें एकदम से नकार दिया जाए। लोग आज भी भगवान की पूजा करते हैं, बच्चे आज भी छात्रावासों में रह कर पढ़ते हैं, जेब गरम हो तो आज भी लोगों की नीयत बदल जाती है, आज भी घर की महिलाओं में तू तू – मैं मैं होती है – बल्कि दोपहर में खास महिलाओं के लिए प्रसारित किए जानेवाले टीवी कार्यक्रमों का यही सदाबहार विषय रहा है, बच्चे (बल्कि कई बार बड़े भी) आज भी अपनी गलती के लिए औरों को जिम्मेदार ठहराते हैं, स्पर्धा का भाव आज भी सबमें एक-सा दिखाई देता है... सो, ये संदर्भ किताब से जुड़ने में सहायक ही हैं। बचपन में बच्चों को अच्छे-बुरे की पहचान कराना माता-पिता की जिम्मेदारी होती है। एक तरह से घर ही बच्चों की पहली पाठशाला होती है और माता-पिता आद्य गुरु होते हैं। आधुनिकता की कई देनों में एक देन यह भी है कि आज हर व्यक्ति टापू में बदलता जा रहा है, अच्छे-बुरे की ठीक से जानकारी न होने के कारण समाज में कई बुरी घटनाएं घटती हैं, एक-दूसरे से जुड़ना, बुराई से बचना यह किताब सिखाती है। इस तरह से किताब लाजवाब है। कई बार किसीके कहने से अधिक पढ़ी हुई बातें मन पर अधिक असर करती हैं।
इस पुस्तक की एक और खासियत है – इसकी क्षेत्रीयता। कोंकण के लोगों की जीवनशैली के इसमें बेहद अनूठे वर्णन हैं। वहां के खान-पान, पहनावे, रीति-रिवाजों का चित्रण है। यहां के सुंदर, सांस्कृतिक जीवन की झांकियां हैं। प्रचलित रीति-रिवाजों का वर्णन पढ़ते हुए कहीं कहीं कुछ बातें स्वीकारने में विज्ञाननिष्ठ बुद्धि के कारण हिचक होती है लेकिन ऐसी बातें गिनी-चुनी हैं। हमें यह बात भी ध्यान में रखनी होगी कि ये बातें हमारे समाज का अंग रही हैं, आवाम की श्रद्धा के साथ इनका गहरा संबंध रहा है। इन्हें टाल कर हमारे समाज का सही चित्रण संभव नहीं।
‘लाडघरचे तामस्तीर्थ’ कथा में इस पुस्तक के उद्देश्य के बारे में कथानायक श्याम के एक मित्र राजा के मुंह से लेखक ने कहा है कि श्याम की ये कहानियां धर्म क्या है बताती हैं। वह कहता है, “जिस प्रकार कृष्ण के छोटे से मुंह में यशोदा को विश्वरूपदर्शन होते हैं उसी प्रकार इन छोटी छोटी कहानियों में संस्कृति और धर्म के विस्तृत दर्शन होते हैं। यह कहानीमय धर्म है या धर्ममय कहानियां हैं। रोजमर्रा के जीवन में भी हृदय में कितना आनंद घोला जा सकता है यही तुम दिखा रहे हो....।” हालांकि, ‘तीर्थयात्रार्थ पलायन’ जैसी कहानी में श्याम के भागने का समर्थन करती मां के साथ सहमत होना मेरे लिए संभव नहीं भले श्याम (लेखक) की नजर में वह सही हों। इस अपवाद को छोड़ दें तो पुस्तक के किसी और निष्कर्ष से मुझे असहमति की कोई वजह दिखाई नहीं देती।
इस पुस्तक की भाषा इसकी बहुत बड़ी शक्ति है। बेहद सरल, आसान भाषा है। कोई बिंब नहीं, सांकेतिकता नहीं, उपमा-उपमान भी एकाध हो तो हो। इसे भाषा की ताकत कहा जा सकता है या जिन्हें साहित्यिक कृति में थोडी-बहुत अलंकारिकता की उम्मीद हो वे इसे सपाटबयानी कह सकते हैं। मेरी राय में गद्य में संप्रेषणीयता भाषा की एक कसौटी मानी जानी चाहिए और इस लिहाज से और अलंकरण से अधिक बच्चा भी किताब को आसानी पढ़-समझ सके इस उद्देश्य को लागू करें तो इस पुस्तक की भाषा में कोई खोट नहीं। भाषा की इसी सरलता से श्याम की मां जिन दुखपूर्ण स्थितियों से गुजरती है, मां के दुख को महसूस कर श्याम का हृदय जो मौन बिलखता है, श्याम के पिता की हताशा सीधे पाठक के हृदय पर आघात करती हैं।
सच है, आज जमाना बदल गया है, हम संपन्न हो गए हैं। पालना घरों में बच्चों के और वृद्धाश्रमों में बूढ़ों के पलने के आज के एकल परिवारवाले युग में न माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय और समर्पितता होती है और न बच्चों के मन में माता-पिता के प्रति कृतज्ञता भाव और कर्तव्यभावना। निजी स्वतंत्रता की हदें दिनोंदिन बेहद धुंधली होती जा रही हैं। स्वार्थ के आगे सहज प्रेम, वात्सल्य, अन्यों की सुरक्षा की भावनाएं भी मायने खोती जा रही है। बच्चे, युवा, अधेड या बूढ़े केवल उपभोक्ता बन कर रह गए हैं। जब तक बेचने-खरीदने की क्षमता है तभी तक किसीका मूल्य है और यह मूल्य भी बाजार तय करता है, व्यक्ति नहीं। और यही बाजार एक सीख भी देता है कि जो मूल्यहीन है वह कचरा है फिर वह चाहे इन्सान ही क्यों न हो। इस कुविचार से आज की पीढ़ि को बचाने के लिए यह पुस्तक असरदार साबित हो सकती है।
किसीके भी प्रति सीमित लगाव रखने के चलनवाले आज के युग में हो सकता है किसीको अपनी मां के प्रति श्याम के प्रेम का प्रकटीकरण बनावटी या अत्युक्तिपूर्ण लगे। भाषा और भाषा के कारण भाव में बनावटीपन महसूस हो सकता है। ऐसा अगर महसूस हो तो एक बात ज़रूर ध्यान में रखें कि, प्रेमभाव, अपनत्व की कमी के कारण आज नाते-रिश्तों में सूखापन आने लगा है। परिवार की संस्था को बनाए रखने के लिए, पारिवारिक रिश्तों-नातों को अहमियत देने की आवश्यकता की ओर ध्यान दिलाने के लिए इन भावनाओं को प्रोत्साहित करना ज़रूरी है। श्याम बेहद संवेदनशील है इसलिए अपनी मां के प्रति उसके मन में प्रेम, आदर और कृतज्ञताभाव इतना तीव्र है। सामान्य संवेदनशीलता वाले हृदय में भी यह भाव कुछ सीमित मात्रा में ही सही लेकिन होने तो चाहिए ही। आज देश के सामने बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रमों के निर्माण का समाधान स्पष्ट रूप धारण करता जा रहा है। ऐसे में उम्मीद है कि माता-पिता के प्रति कृतज्ञता भाव निर्माण करनेवाली इस किताब का सुधी पाठकों से स्वागत ही होगा। 

Sunday, July 6, 2014

कवि कुसुमाग्रज और उनकी कविता

©-संध्या पेडणेकर
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित मराठी के सिद्धहस्त साहित्यकार विष्णु वामन शिरवाडकर ने मराठी साहित्य को अपनी कविताओं, नाटकों, कथाओ, उपन्यासों, निबंधों से समृद्ध किया है। आम आदमी के मन की व्यथा, करुणा, उछाह, क्रोध, चैतन्य, आशावाद, जीजिविशा आदि को कुसुमाग्रज ने अपने काव्य में व्यक्त किया है।
कुसुमाग्रज बनाम तात्या का मूल नाम गजानन रंगनाथ शिरवाडकर था। बचपन में ही तात्या को उनकी एक चाची ने गोद लिया था। तब उन्हें एक नया नाम मिला – विष्णु वामन शिरवाडकर। प्रारंभिक शिक्षा के लिए छह साल कुसुमाग्रज अपने मामा के घर नासिक में रहे। उनके मामा- राजाराम वामन जानोरकर कवि थे। यहीं से कुसुमाग्रज में पढ़ने-लिखने के प्रति रुचि निर्माण हुई।
1925 के आसपास बच्चों की पढ़ाई के लिए तात्या के पिता पिंपलगांव से नासिक आए। तात्या उस वक्त कॉलेज में पढ़ते थे इसलिए उनकी पढ़ाई के लिए अलग से कमरा लिया गया। उस कमरे का तात्या के साहित्यिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। इसी कमरे में रात रात भर जाग कर उन्होंने साहित्य का अध्ययन किया। उनके हित्य की गंगोत्री का पद उसी कमरे को है। उस छोटे से कमरे कमरे में दरी पर बायरन, माधव ज्यूलियन की तस्वीरें सजा कर रखी तीं। एक और सिलसिले में इस कमरे का महत्व है। पुणे में कुछ कवियों ने मिल कर ‘रविकिरण मंडल’ की स्थापना की थी। इस मंडल का मराठी साहित्य के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान है। उस मंडल के अनुकरण में नासिक के इसी कमरे में 1931 से 1933 के दरमियान ‘ध्रुवमंडल’ की स्थापना हुई। इस मंडल की एक मात्र स्मृति अब उनके पास बची है। उनका प्रथम काव्यसंग्रह ‘जीवनलहरी’। इस मंडल के सदस्यों में प्रो जोगलेकर, स वा केलकर, माधव मनोहर, द रा पोल, गोपालदास खरे आदि लोग थे।
1935 में बी ए होने के पश्चात तात्यासाहब ने सरकारी या गैरसरकारी किसी भी तरह की नौकरी न करने का अपना निर्णय घर में बताया। घर के लोग चिंतित हुए। उस दौरान उनके घर की माली हालत भी ठीक नहीं थी। फिर भी बेटे के निर्णय का पिता ने विरोध नहीं किया। बेटे के अलग व्यक्तित्व को उन्होंने पहचान लिया था। तब तक तात्या की कविताएं विभिन्न पत्रिकाओं में छपने लगी थीं।
नौकरी न करने के तात्यासाहब के निर्णय से घर के लोगों को आश्चर्य नहीं हुआ लेकिन उनके फिल्म जगत में काम करने की इच्छा से घर के सभी लोगों को चौंका दिया। फिल्म के नायक बनने की तात्यासाहब की इच्छा थी। फिल्म जगत के आदिपुरुष नासिक के श्री दादासाहब फालके के शिष्यों में से श्री मामा शिंदे के साथ तात्यासाहब ने नासिक में ‘गोदावरी सिनेटोन’ कंपनी की स्थापना की। लेखन कार्य की पूरी जिम्मेदारी तात्यासाहब ने संभाली। गोदावरी सिनेटोन की पहली फिल्म थी ‘सती सुलोचना’। इस फिल्म की कथा तात्यासाहब ने लिखी थी। साथ ही साथ उन्होंने फिल्म में लक्ष्मण नाम के चरित्र की भूमिका भी निभाई थी। फिल्म चली नहीं। फिर, इसी क्षेत्र में यश कमाने की मंशा लेकर मामा शिंदे के साथ तात्या मुंबई आए।
मुंबई में तात्या तथा मामा शिंदे लैमिंग्टन रोड के चुनाम लेन की संकरी गली की एक बिल्डिंग के एक चोटे से कमरे में रहते थे। उस कमरे की तथा उस समय तात्यासाहब की मुफलिसी केवल एक ही बात से साफ जाहिर होती है कि उस वक्त उनके पास पानी पीने के लिए भी कोई बर्तन नहीं था। ऐसी हालत से ऊब कर मामा शिंदे तकदीर आजमाने मद्रास की ओर रवाना हुए। लेकिन तात्यासाहब ने मुंबई को ही अपनी कर्मभूमि बनाया। और यहीं रह कर साहित्यसृजन में लगे रहे।
आठ दस महीनों की बेकारी के बाद एडवोकेट सं सा दौंडकर के साप्ताहिक ‘सारथी’ में तात्या ने सहसंपादक की हैसियत से काम संभाला। तनख्वाह पचास रुपयों के आसपास थी जिसमें उनका महीने का खर्चा भी बड़ी मुश्किल से चलता था। ‘सारथी’ ने तात्या को पत्रकार बनाया।
इस शुरुआत के बाद लगभग बाह सालों तक तात्या इसी व्यवसाय में रहे। ‘सारथी’ डेढ़-दो सालों तक चला। उसके बाद तात्या पुणे चले गए। पुणे  वालचंद कोठारी की दैनिक पत्रिका ‘प्रभात’ में वह तीन सालों तक उपसंपादक रहे। इसी दरमियान बंगाल के दमदम जेलखाने में कुछ राजबंदी आमरण अनशन पर थे। उनकी हालत गंभीर होने की खबर आई थी। उस खबर का अनुवाद करते समय कवि के मन में भावों का तूफान आया जिसके परिणामस्वरूप पिछले पचास सालों से मराठी मन को क्रांति का संदेश देकर जागृत करनेवाली कविता ‘गर्जा जयजयकार क्रांतीचा गर्जा जयजयकार’ का जन्म हुआ। ‘प्रभात’ के बाद पुणे के ही डॉ परुलेकर के प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘स्वराज्य’ में  सालों तक रहे। फिर मुंबई लौट कर प्रभाकर पाध्ये के साथ ‘धनुर्धारी’ में काम किया। पाध्ये और तात्या ने अंग्रेजी के ‘नवयुग’ में भी साथ साथ काम किया। मुंबई छोड़ नासिक जाने के बाद स्व श्री रमाकांत वेलदे के साथ ‘स्वदेश’ नामक साप्ताहिक पत्रिका शुरू की। इस पत्रिका के बंद होने के साथ साथ तात्यासाहब के जीवन का पत्रकारिता का अध्याय भी समाप्त हुआ। उनके जीवन का यह पूरा कालखंड बड़ा कष्टमय रहा। इस काल में लिखी उनकी कविताओं में इसका स्पष्ट प्रतिबिंब दिकाई देता है। अपने तथा आसपास के लोगों की असहायता तथा मजबूरी, उसका सामाजिक संदर्भ जानने-समझने में पत्रकारिता का यह कालखंड उपयोगी सिद्ध हुआ।
1941 से 1946 के दरमियान दादर की हिंदू कॉलनी के भालचंद्र रोड़ पर ‘चारूसदन’ बंगले के आऊटहाऊस के एक कमरे में तात्या रहा करते थे। इसी दौरान पाध्ये और उनके बीच अटूट रिश्ता निर्माण हुआ। ‘ज्योत्स्ना’ मासिक पत्रिका में लिखने के कारण उसके संपादक वामनराव ढवले के साथ तथा अनंत काणेकर, बा भ बोरकर, पु भा भावे आदि मराठी के प्रसिद्ध साहित्यकारों के साथ इसी कालखंड में उनकी दोस्ती हुई।
1942 में तात्या का प्रसिद्ध काव्यसंग्रह ‘विशाखा’ प्रकाशित हुआ। मराठी रसिकों ने इस संग्रह को सिर पर उठा लिया। 1944 में नासिक की मनोरमा सोनवणी के साथ तात्या का विवाह हुआ। उसके बाद हर शनिवार-रविवार को वे नासिक हो आते। कभी एकाध-दो दिन और रुक जाते। इससे उनके पत्रकारिता से संबद्ध लेखनकार्य में अनियमितता आई। इसलिए 1946 में तात्या ने मुंबई को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया और नासिक में डेरा डाला।
तात्या की पत्नी म्युनिसिपल स्कूल में प्रधानाध्यापिका थीं। शादी के साल भर बाद एक पुत्र रत्न की प्राप्ति भी हुई लेकिन दुर्भाग्य से किसी कारणवश वह चल बसा। 1972 में कैंसर के कारण पत्नी भी गुजर गईं। उसके बाद तात्यासाहब ने जिंदगी अकेले ही काटी।

                  कुसुमाग्रज की कविता 

'जीवनलहरी' कुसुमाग्रज का पहला कवितासंग्रह है। इसमें कवि ने आठ पंक्तियोंवाला एक नया काव्यवृत्त अपनाया। इस संग्रह की सभी कविताएं इसी वृत्त में लिखी गई हैं। इन छोटी छोटी कविताओं में अलग अलग भाव व्यक्त हैं। एक वृत्त में बाव पूरी तरह व्यक्त न हुआ हो तो उसके बाद के वृत्त में उसे पूरा किया गया है। कविताओं का स्वर आदर्शवादी है। उस युग के प्रसिद्ध कवि श्री गोविंदाग्रज की स्पष्ट छाप इस संग्रह की कविताओं प रदेखने मिलती है। तात्यासाहब पर गोविंदाग्रज के प्रभाव की कल्पना इस बात से की जा सकती है कि उनके कविनाम की तर्ज पर उन्होंने अपना कविनाम लिया -कुसुमाग्रज। कुसुमाग्रज की काव्यसृष्टि में व्यक्त चिरंतन तत्वों के इस कवितासंग्रह में भी दर्शन होते हैं। जैसे-
"गरीबी हा दोषच का 
फोडिती का हे टाहो
ऐकत चैनीत हाका
देव कसा निजला हो"
(गरीबी दोष क्यों है? इन्हें इसप्रकार बुक्का फाड़ कर क्यों रोना पड़ता है? उनकी पुकारें सुनते हुए भगवान सोया क्यों रहता है?)
तथा-
"हे देऊळ ही नीती। सत्तेचे हे कावे।।
जुलुमाहुन अन्य जगी। पाप न आम्हां ठावे।।"
(मंदिर और नीति सब सत्ता की कारस्तानियां हैं। हम जानते हैं कि दुनिया में जुल्म से बढ़ कर कोई पाप नहीं होता।)
'जीवनलहरी' का दूसरा संस्करण 1949 में प्रकाशित हुआ। मूल किताब की 35 कविताओं का इसमें परिष्करण किया है, 27 कविताएं हटा दी हैं और नई 105 कविताओं को शामिल किया है। इसीलिए आलोचक  द दि पुंडे की राय में यह 1933 में प्रकाशित जीवनलहरी का द्वितीय संस्करण नहीं बल्कि 1949 में प्रकाशित नई कृति है। (आलोचना, जुलाई 1983, पृ 5) विचारों के स्तर पर इस पूरे द्राविडी प्राणायाम के बावजूद 1949 की जीवनलहरी 1933 के संस्करण से अलग नहीं है। 

जीवनलहरी के बाद आए कवितासंग्रह 'विशाखा' तक कवि की वैचारिक प्रक्रिया काफी प्रौढ़ दिखाई देती है। असल में रशियन क्रांति, 1934 से 1941 तक का हिटलर का कालखंड आदि बातों के कारण दुनिया प्रभावित थी। भारत में भी इस दौरान स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए संघर्ष जारी था। भगतसिंग, राजगुरु, सुखदेव आदि फांसी के तख्ते पर हंसते हुए लटक गए थे। सुभाष चंद्र बोस, महात्मा गांधी आदि कई देशभक्तों की आवाज बुलंद थी। इन सभी संघर्षों के चित्र विशाखा में देखने मिलते हैं। 'विशाखा' में एक ओर वर्गसंघर्ष की कविताएं हैं, जैसे - आगगाडी आणि जमीन, अहि-नकुल, हिमलाट जिसमें प्रकट ही कवि शोषितों के पक्ष में है और शोषकों के विनाश का सपना देखता है। दलितों के करुण चित्र भी- माळाचे मनोगत, पाचोळा जैसी कविताओं में दिखाई देते हैं। भव्य, दिव्य, तेजस्वी, श्रेष्ठ से कवि का प्रेम यहां भी व्यक्त है। कर्तव्यपूर्ति के प्रति निष्ठा की आवश्यकता वह मानते हैं।उनके मन का सूक्ष्म द्वंद्व इस प्रकार व्यक्त होता है- 
"ध्येय, प्रेम, आशा यांची
होतसे का कधी पूर्ति
वेड्यापरि पूजतो या
आम्ही भंगणाऱ्या मूर्ती" 
(लक्ष्य, प्रेम, आशा की कभी पूर्तता नहीं होती। हम ही हैं कि पागलों की तरह इन टूटनेवाली मूर्तियों की पूजा करते रहते हैं।)
पर इस द्वंद्व को उनका अदम्य आशावाद मात दे जाता है। सामाजिक कविता हो, राष्ट्रीय कविता हो या प्रेमकविता, हर जगह उनका यह आशावाद दिखाई देता है। सामाजिक जिम्मेदारी की बलशाली अनुभूति में प्रेम को बाधास्वरूप मानने का भाव विशाखा में दिखाई देता है उस जमाने के युवा युवतियों की कोमल बाहों के हार के अभिलाषी तो ज़रूर थे पर कर्तव्यपूर्ति को वे उससे श्रेष्ठ मानते थे।
केशवसुत के बाद सामाजिक जिम्मेदारी का भाव मराठी काव्य में कुसुमाग्रज ही ले आए। एक जगह उन्होंने कहा है –
“काढ सखे गळ्यातील तुझे चांदण्यांचे हात
क्षितिजाच्या पलिकडे उभे दिवसाचे दूत.”
(सखी मेरे गले से अपने चांदनियों से हाथ हटाओ, क्षितिज के उस पार दिन के दूत खड़े हैं – सुबह होने में है।)
उनकी कविता की नायिका भी सामर्थ्य की, भव्योदात्त की पूजा करती हुई पाठकों के सामने आती है। ‘पृथ्वीचे प्रेमगीत’ कविता में सूर्य से प्रेम करनेवाली पृथ्वी कहती है-
“परि भव्य ते तेज पाहून पुजून
घेऊ गळ्याशी कसे काजवे!
नके क्षुद्र शृङ्गार तो दुर्बळांचा
तुझी दूरता त्याहूनी साहवे!”
(इस कविता में कवि कल्पना करते हैं नायिका पृथ्वी नायक सूर्य से प्रेम करती है। अन्य ग्रह उससे प्रेम पाने के इच्छुक हैं लेकिन वह कहती है कि हे सूरज, तुम्हारा भव्य-दिव्य तेज देखने के बाद मैं इन जुगनुओं को कैसे गले लगाऊं? भले मुझे तुमसे दूर रहना पड़े, दुर्बलों का क्षुद्र शृङ्गार मुझे नहीं चाहिए।)
इस संग्रह में कवि के श्रद्धालु मन की आध्यात्मिक अनुभूति को सामाजिक यथार्थ की अनुभूति तरह देती हुई दिखाई देती है। सामाजिक यथार्थ की ओर संकेत करते हुए वह उपरोध से कहते हैं –
“म्हणतात तुमच्या दयेला न अंत
पुकारती संत थोरी तुझी
चिमण्यांच्या घरा लाविसी आग
केवढी विशाल दया तुझी!”
(कहते हैं कि तुम्हारी दया का कोई आर-पार नहीं है, लेकिन छोटे-छोटे जीवों के घरों पर गाज गिराते हो तुम, कितनी विशाल दया है तुम्हारी!)
निराशावादी विचारों से कवि अपने को इस संग्रह में प्रयत्नपूर्वक निर्लिप्त रखते दिखाई देते हैं हालांकि अटल विनाश की काली छाया को उन्होंने उतनी ही ताकद के साथ व्यक्त भी किया है –
“मातीवर चढणे एक नवा थर अंती”
(अनिवार्य अंत यही कि, मिट्टी पर एक नई परत चढ़ेगी।)
‘गर्जा जयजयकार’ यह उनकी प्रसिद्ध कविता भी इसी संग्रह में है। इसतरह, विशाखा में एक र हम उनकी खय्याम पर लिखी कविता देखते हैं तो दूसरी तरफ क्रूर सत्य, वास्तविकताएं आदि को भी यहां वाणी मिली है। दो परस्परविरोधी चीजों का प्राकृतिक या कविनिर्मित संघर्ष नाट्यपूर्ण रूप से वह शुरू से अंत तक ले जाते हैं। भव्य उपमाओं के कारण भव्यता के प्रति उनकी आसक्ति प्रकट होती है। अताह कल्पनाशक्ति के दर्शन होते हैं। इस अथाह कल्पनाशक्ति का सबल आधार उनकी कलात्मक शब्दयोजना है। इसके सहारे विषयवस्तु का वे समानुपातिक प्रतिपादन करते हैं। हम कह सकते हैं कि ‘विशाखा’ में प्रकट दर्शन कालसापेक्ष होने के बावजूद उनकी कविता युग के सत्य तक पहुंची है।  
‘विशाखा’ की गेय कविताओं के बाद कवि का गद्यकाव्यसंग्रह ‘समिधा’ निकला। इस संग्रह में कुल 40 कविताएं हैं। कवि की विशाल कल्पनाशक्ति, ओजस्वी प्रतिमाएं, आग तथा प्रकाश के प्रति कवि का आकर्,ण इस संग्रह में व्यक्त हुआ है। उनका रचनाकौशल तथा शब्दभंडार की विविदता भी इस संग्रह में व्यक्त है। मराठी कविता में कुसुमाग्रज के इन गद्य काव्यों का अपना स्तान है।
‘विशाखा’ के प्रकाशन के दस सालों बाद उनका ‘किनारा’ कवितासंग्रह निकला। ‘किनारा’ में कवि साम्यवाद से समाजवाद की तरफ झुकते नजर आते हैं। ईश्वरी सत्ता को जहां विशाखा में नकारा गया है वहीं किनारा में कवि अज्ञात को मान्यता देता हुआ दिखाई देता है। इस संग्रह की कविताओं में कवि का मन होने-न-होने की भावनाओं के बीच झूलता-सा नजर आता है –
“अससी सतत मला अज्ञात
कणा कणातुन तव कानोसा घेतो जरी जगतात
नदीकिनारी अमल जलातुन
गमते पलभर हो तव दर्शन
तोच पडोनी पर्ण लोपते प्रतिमा जलवलयात”
(दुनिया के हर जर्रे से मुझे तुम्हारे होने का अहसास होता तो है, कभी नदी किनारे बैठा रहता हूं तब स्वच्छ जल में तुम्हारा प्रतिबिंब दिखाई देता है, ध्यान से देख सकूं तभी पत्ता गिरने से उठती तरंगों के बीच तुम्हारी वह प्रतिमा खो जाती है।)
बाह्यघटकों और आत्मानुभूति का जो सामंजस्य ‘विशाखा’ में हम देखते हैं वहीं ‘किनारा’ में आत्मानुभूति का अभाव-सा महसूस होता है। सामाजिक गटनाओं से यहां वे उद्वेलित तो दिखाई देते हैं लेकिन इस उद्वेलन की कारणमीमांसा वे नहीं कर पाते।
“किसी निर्जन द्वीप पर जाते समय केवल एक ही किताब अगर साथ में लेनी हो तो मैं ‘मेघदूत’ ही चुनूंगा”- कह कर कुसुमाग्रज ने मेगदूत के प्रति अपनी भक्ति का परिचय दिया है। इसी प्रेम के कारण शायद वह अनुवाद की ओर मुड़े हों। अनुवाद की सीमाओं को ध्यान में रखते हुए इस अनुवाद से उनकी प्रतिभा, शब्दों को अपनी मर्जी के अनुसार मोडने की उनकी सामर्थ्य, सुयोग्य शब्दचयन आदि का पता चलता है।

1952 से लेकर 1960 तक का समय राष्ट्रीय इतिहास के कालखंड के नजरिए से संघर्षशून्य समय है। उस दौरान आजादी के कारण सबका मन तृप्त था। समाज एक मीठे उनींदेपन में डूबा था। इस भावस्थिति की छाप उनके संग्रह ‘मराठी माती’ पर दिखाई देती है। इस पूरे संग्रह में ‘ध्वजगीत’ यही एक राष्ट्रीय भाव व्यक्त करती कविता है – सामाजिक से अदिक निजी बावों के प्रकटीकरण की ओर इस संग्रह की कविताएं झुकती हैं। ‘विशाखा’ में प्रेमबंधन से दूर रहनेवाला भाव ‘किनारा’ में स्मृतिव्याकुल बना है तो ‘मराठी माती’ में प्रेम के प्रकटीकरण पर निर्बंध लादे गए हैं। ‘किनारा’ में आध्यात्म की ओर झुकनेवाला भाव यहां और स्पष्ट हुआ है। इस संग्रह में प्रकृति-वर्णन करनेवाली कविताओं की संख्या भी ध्यान खींचनेवाली है।
‘मराठी माती’ के आने के तुरंत दूसरे साल ही उनका ‘स्वगत’ संग्रह आया जिसके भाव में ‘मराठी माती’ में व्यक्त बाव से कोई फेर नजर नहीं आता। ‘स्वगत’ में व्यक्तिपरक तथा स्थलों का वर्णन करनेवाली कई कविताएं हैं। 1962 तक स्वतंत्र भारत संघर्षहीन, आत्मलीन रहा, सायद इसीलिए कवि को इतिहास की तरफ मुड़ना पड़ा। इसके अलावा अपनी सामाजिक जागरुकता और प्रतिक्रियाओं की ओर तटस्थता से देखने की कवि की मनोवृत्ति यहां दिखाई देती है –
“हजार डोळ्यांमधले पाणी
माझ्या डोळ्यांमध्ये जमे
हजार कंठातील घोषणा
माझ्या कंठामध्ये घुमे
हजार हृदये गहिवरती तर
मन माझे ही गहिवरते
असे हजारासंगे आहे
जडलेले माझे नाते
असेच आहे आणि तरीही
अनोळखी मी सदाच राही
दूर हजारापासुनि आहे
विजनामधि माझे घरटे
मीपण भरले जयात माझे
जे आहे माझ्यापुरते”
‘मराठी माती’ की परतत्व अनुभूति की खोज इस संग्रह में भी दिखाई देती है। आस्तिकता साथ नहीं छोड़ती और नास्तिकता का आकर्षण बुलाता रहता है। कवि की प्रतिभा आध्यात्मिकता की खोज में डूबी रहती है।
‘किनारा’ के बाद एक बार फिर ‘हिमरेषा’ में कवि की सोई राष्ट्रीय अनुभूति अंगडाई लेती दिखाई देती है। चीन के आक्रमण के पश्चात एक बार फिर कवि की प्रतिभा जाग उठी और उसने ‘आवाहन’, ‘निर्धार’, ‘रक्त तुझे हे’ आदि कविताओं से चीन के आक्रमण के खिलाफ बारतीयों के मन की आग को शब्दबद्ध किया। ‘विशाखा’ की ‘मात’ कविता की तरह ‘चार कोळसेवाले’ यह इस संग्रह की कविता है। ‘मध्यमवर्ग : समस्या’, ‘मध्यमवर्ग : विचारशीलता’ आदि उपहासात्मक कविताएं भी इस संग्रह में शामिल हैं।   
राष्ट्र रणसम्मुख हो तो अब तक कुसुमाग्रज की कविता भी रणसम्मुख होती आई थी, पर 1965 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध तथा विजय का जिक्र इस संग्रह की कविताओं में अपेक्षित होते हुए भी बिल्कुल नहीं दिखाई देता। ‘असह्य’ कविता कुछ हद तक ठीक बन पड़ी है। प्रेमभाव व्यक्त करनेवाली ‘क्षणिक’ कविता में एक सुंदर चित्र वह खींचते हैं –
“मस्तक ठेवुनि गेलीस जेव्हा
अगतिक माझ्या पायावरी
या पायांना अदम्य इच्छा
ओठ व्हायची झाली होती.”
बिल्कुल अलिप्त भाव से प्रेम करनेवाली, प्रियतम की यशोगाथा दूर ही से गाने वाली, वेदना सहनेवाली नायिका का चित्र कुसुमाग्रज शुरू से खींचते आए हैं। इस संग्रह की ‘गवळण’, ‘गीत’ कविताएं इसी तरह की हैं। इसके अलावा कवि ने इस संग्रह में कुछ मजाकिया कविताएं लिखने की भी कोशिश की है।
‘वादळवेल’ के बारह सालों बाद कवि का ‘छंदोमयी’ कविता संग्रह प्रकाशित हुआ। ‘छंदोमयी’ में एक बार फिर वह सजग हुए दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचार, लाचारी का वर्णन यहां मिलता है। इस संग्रह की प्रेम कविता भी मूक प्रेम की महिमा गाती है। इन सभी कविताओं की पृष्ठभूमि पर ‘अगतिक’ कविता मन मोह लेती है।
 ‘जाईचा कुंज’ और ‘श्रावण’ ये दो कवि के बाल कविता संग्रह हैं। इनमें कवि बालकों के साथ तद्रूप होने की कोशिश करते दिखाई देते हैं।
इस प्रकार, इन 14 कवितासंग्रहों में व्यक्त कविताओं में एक निश्चित तत्व के सहारे उत्तरोत्तर प्रकट होते गए हैं। थोडे में कहना हो तो, कवि कुसुमाग्रज की कविता सुंदर है जिसने मराठी पाटकों के मन पर लगभग 50 वर्षों तक राज किया।
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कुसुमाग्रज की साहित्य संपदा
कविता संग्रह-
जीवनलहरी (1933), जाईचा कुंज (बालकाव्य, 1936), विशाखा (1942), समिधा (गद्यगीत,1947), जीवनलहरी -2 (1949), किनारा (1952), मेघदूत (अनुवाद, 1956), मराठी माती (1960), स्वगत (1962), हिमरेषा (1964), वादळवेल (1969), छंदोमयी (1982), मुक्तायन (1984), श्रावण (बालकाव्य 1985).
नाटक
दुसरा पेशवा (1947), कौंतेय (1953), दिवाणी दावा (1954), देवाचे घर (1956), ययाति आणि देवयानी (1966), आमचं नाव बाबूराव (1966), वीज म्हणाली धरतीला (1970), नटसम्राट (1971), विदूषक (1973), एक होती वाघीण (1975), आनंद (1976), मुख्यमंत्री (1979), चंद्र जिथे उगवत नाही (1981), नाटक बसते आहे और दो एकांकी।
उपन्यास
कल्पनेच्या तीरावर (1956), वैष्णव (1946), जादूची होडी (1950, बच्चों के लिए), जान्हवी (1952).
कथासंग्रह
फुलवाली (1950), सतारीचे बोल आणि इतर कथा (1958), काही वृद्ध काही तरुण (1961), प्रेम आणि मांजर (1964), कुसुमाग्रजांच्या बारा कथा (1968), अपॉइंटमेंट (1978).
लेखसंग्रह
आदर्श निबंध (1952), आहे आणि नाही (1957), विराम चिह्ने (1970), प्रतिसाद (1976), एकाकी तारा (1982), शोध शेक्सपीयरचा (1983), साहित्य : आग्रह आणि दुराग्रह (1960).
कुसुमाग्रज का अनूदित साहित्य
दूरचे दिवे (आइडियल हजबंड, ले. ऑस्कर वाइल्ड, 1946 ), राजमुकुट (मैकबेथ, ले. शेक्सपीयर, 1954), वैजयंती (मॉरिस -मेटर लिंक, 1956), ऑथेल्लो (शेक्सपीयर, 1961), बेकेट (ज्यां अनुई, 1971), महंत (1986).
इसके अलावा उनका संपादित साहित्य भी है।